दोह्यांच्या स्वरूपातील अभंग तसेच हिंदुस्थानी भाषेतील पदे
दोहोरे (अभंग संख्या १)
४२२. तुका बस्तर बिचारा क्या करो रे । अंतर भगवान होय । भीतर मैला कब मिटो रे । मरे उपर धोय ॥ १ ॥ रामराम कहे रे मन । औरसुं नहीं काज। बहुत उतारे पार । आगे राखे तुकाकी लाज ॥ २ ॥ लोभीके चित्त धन बैठें। कामिनीके चित्त काम । माताके चित्त पूत बैठे। तुकाके मन राम ॥ ३ ॥ तुका पंखि बहिर न मानुं । वाेहि जनावर बाग । असंतनकु संत न मानुं । जे वर्मकु दाग ॥ ४ ॥ तुका राम बहुत मिठा रे । भर राखु शरीर । तनकी करूं नावरि । उतारूं पैल तीर ॥ ५ ॥ संत पन्हैया ले खडा । राहूं ठाकुरद्वार । चलत पाछे हुँ फिरों । रज उडत लेऊं सीर ॥ ६ ॥ तुका प्रभु बडो न मनूं न मानूं बडो । जिसपास बहु दाम । बलिहारी उस मुखकी । जिस्ते निकसे राम ॥ ७ ॥ राम कहे सो मुख भला रे । खाये खीर खांड । हरिबिन मुखमो धूल परी रे । क्या जनी उस रांड ॥ ८ ॥ राम कहे सो मुख भला रे । बिन रामसे बीख । अब न जानूं मते बेरों । जब काल लगावे सीख ॥ ९ ॥ कहे तुका मैं सवदा बेचूं । लेवेके तन हार । मिठा साधुसंतजन रे । मुरखके सीर मार ॥ १० ॥ तुका दास तिनका रे । रामभजन निरास । क्या बिचारे पंडित करो रे । हात पसारे आस ॥ ११ ॥ तुका प्रीत रामसुं । तैसी मिठा राख । पतंग जाय दीपपरे । करे तनकी खाक ॥ १२ ॥ कहे तुका जग भुला रे । कह्या न मानत काेय । हात परे जब कालके । मारत फोरत डाेय ॥ १३ ॥ तुका सुरा नहीं सबदका रे । जब कमाई न होय । चोट साहे धनकी रे । हिरा नीबरे तोय ॥ १४ ॥ तुका सुर बहुत कहावे । लडत बिरला कोय । एक पावे ऊंच पदवी । एक खौंसा जोय ॥ १५ ॥ तुका माऱ्या पेटका । और न जाने कोय। जपतां कछु रामनाम । हरिभगतनकी साेय ॥ १६ ॥ काफर सोही आपन बुझे । अल्ला दुनियां भर । कहे तुका तुम्ही सुनाे रे भाई । हिरदा जिन्हका कठोर ॥ १७ ॥ भीस्त न पाइये मालथी । पढिया लोक रिझाये । निचा जथें कमतारिव । सोही सो फल खाये ॥ १८ ॥ फल पाया तो सुख भया । किन्होसो न करे वेवाद । वान न देखे मिरगी । चित्त मिलाया नाद ॥ १९ ॥ तुका दास रामका । मनमे एक हि भाव । तो न पालटे आब । ये हि तन जाव ॥ २० ॥ तुका रामसुं चित्त बांधराखो । तैसा आपने हात । धेनु बछरा छोर जावे । प्रेम न सुटे सात ॥ २१ ॥ चित्तसुं चित्त जब मिले । तब तन थंडा होय । तुका मिलना जिन्हेसुं । ऐसा बिरला कोय ॥ २२ ॥ चित्त मिले तो सब मिले । नहिं तो फुकट संग । पानी पाथर एक ठोर । कोरा न भिजे अंग ॥ २३ ॥ तुका संगत तिनसे कहिये । जिनसें सुख दुनाय । दुर्जन तेरा मुख काला । थीता प्रेम घटाये ॥ २४ ॥ तुका मिलना तो भला । मनसुं मन मिल जाई । उपर उपर मट्टी घसनी । उनकी कोन बऱ्हाई ॥ २५ ॥ तुका कुटुंब छाेरे रे । लरके जोरों सिर मुंदाय । जबथे इच्छा नहिं मुई । तब तूं किया काय ॥ २६ ॥ तुका इच्छा मिटाई तो । काहा करे जट खाक । मथीया गोला डारदिया तो । नहिं मिले फेरन ताक ॥ २७ ॥ ब्रीद मेरे साइंयाके । तुका चलावे पास। सुरा सुहि लरे हमसें । छोरे तनकी आस ॥ २८ ॥ कहे तुका भला भया। हम हूं संतनका दास । क्या जानूं केते मरते । वो न मिटती मनकी आस ॥ २९ ॥ तुका और मिठाई क्या करूं रे । पाले विकार पिंड । राम कहावे सो भली रुखी । माखन खीर खांड ॥ ३० ॥
हिंदुस्थानी पदे (अभंग संख्या २०)
४२३.
क्या गाऊं कोई सुननेवाला । देखें तो सब जगही भुला ॥ १ ॥ खेलों आपने
रामहिसात । जैसी वैसी कररहूं मात ॥ २ ॥ काहांसे लाऊं मधुरा बानी । रीझे ऐसी
लोक बिरानी ॥ ३ ॥ गिरीधर लाल तो भावका भुका । राग कला नहिं जानत तुका ॥ ४ ॥
४२४.
छोडें धन मंदिर बन बसाया । मांगत टुका घरघर खाया ॥ १ ॥ तीनसों हम करवाें
सलाम । ज्यामुख बैठा राजाराम ॥ २ ॥ तुलसीमाला बभूत चऱ्हावे । हरजीके गुण
निर्मल गावे ॥ ३ ॥ कहे तुका जो सांई हमारा । हिरनकश्यप जिन्हे मारहि डारा ॥
४ ॥
४२५. मंत्रतंत्र नहिं मानत साखी । प्रेमभाव नहिं अंतर राखी ॥ १
॥ राम कहे त्याके पग हूं लागू । देखत कपट अभिमान दूर भागूं ॥ २ ॥ अधिक
जाती कुल नहिं जानूं । जाने नारायन सो प्रानी मानूं ॥ ३ ॥ कहे तुका जीव तन
धन डारू वारी । राम उपासहुं बलियारी ॥ ४ ॥
४२६. हरिसूं मिल दे एकही
बेर । पाछे तूं फेर नावे घर ॥ धृ. ॥ मात सुनों दुति आवे मनावन । जाया करती
भर जोबन ॥ २ ॥ हरिसुख मोहि कहिया न जाय । तब तूं बुझे आगो पाय ॥ ३ ॥ देखहि
भाव कछु पकरी हात । मिलाई तुका प्रभुसात ॥ ४ ॥
४२७. क्या कहूं नहिं
बुझत लोका । लिजावे जम मारत धका ॥ १ ॥ क्या जीवनेकी पकरी आस । हातों लिया
नहिं तेरा घास ॥ २ ॥ किसे दिवाने कहता मेरा । कछु जावे तब तूं सब ल्या
न्यारा ॥ ३ ॥ कहे तुका तूं भया दिवाना । आपना विचार करले जना ॥ ४ ॥
४२८.
कब मरूं पाऊं चरन तुम्हारे । ठाकुर मेरे जीवन प्यारे ॥ धृ. ॥ जग डरे
ज्याकुं सो मोहि मीठा । मीठा दर आनंदसाहि पैठा ॥ २ ॥ भला पाऊं जनम इन्हें
बेर । सब मायाके असंग फेर ॥ ३ ॥ कहे तुका धन मानहि दारा । वोहि लिये गुंडली
पसारा ॥ ४ ॥
८२९. दासाें पाछें दौर राम । सोवे खडा आपे मुकाम ॥ १ ॥
प्रेम रसडी बांधी गले । खैच चले तब मोही उधर ॥ २ ॥ आपने जनसुं भुल न देवे ।
कर हि धर आगे बाट बतावे ॥ ३ ॥ तुका प्रभु दीनदयाला । वारि रे तुज पर हुं
गोपाला ॥ ४ ॥
४३०. ऐसा कर घर आवे राम । और धंदा सब छोर हि काम ॥ १ ॥
इतने गोते काहे खाता । जब तूं आपना भूल न होता ॥ २ ॥ अंतरजामी जानत साचा ।
मनमे एक उपर बाचा ॥ ३ ॥ तुकाप्रभु देशबिदेश । भरिया खाली नहि लेस ॥ ४ ॥
४३१.
मेरे रामको नाम जो लेवे बारोबार । त्याके पाऊं मेरे तनकी पैंजार ॥ धृ. ॥
हांसत खेलत चालत वाट । खाना खाते सोते खाट ॥ २ ॥ जातनसुं मुझे कछु नहिं
प्यार । असतके नहिं हिंदु धेड चंभार ॥ ३ ॥ ज्याका चित्त लगा मेरे रामको नाम
। कहे तुका मेरा चित्त लगा त्याके पाव ॥ ४ ॥
४३२. आप तरे त्याकी
कोन बऱ्हाई । औरनकुं भलो नाम धराई ॥ धृ. ॥ काहे भूमि इतना भार राखे । दुभत
धेनु नहिं दुध चाखे ॥ २ ॥ बरसत मेघ फलतहि बिरखा । कोन काम आपनी उन्हो तिरखा
॥ ३ ॥ काहे चंदा सुरज खावे फेरा । खिन एक बैठ न पावत घेरा ॥ ४ ॥ काहे परिस
कंचन करे धातु । नहिं मोल तुटत पावत घातु ॥ ५ ॥ कहे तुका उपकार हि काज ।
सब कर रहिया रघुराज ॥ ६ ॥
४३३. जग चले उस घाट कोन जाय । नहिं समजत
फिरफिर गाेतें खाय ॥ धृ. ॥ नहिं एक दो सब संसार । जो बुझे सो आगला स्वार ॥ २
॥ उपर स्वार बैठे तृष्णापीठ । नहिं वाचे कोई जावे लुट ॥ ३ ॥ देखहि डर फेर
बैठा तुका । जोवत मारग रामहि एका ॥ ४ ॥
४३४. भले रे भाई जिन्हें
किया चीज । अच्छा नहिं मिलत बीज ॥ धृ. ॥ फीरतफीरत पाया सारा । मीठत लोले धन
किनारा ॥ २ ॥ तीरथ बरत फिर पाया जोग । नहिं तलमल तुटत भवरोग ॥ ३ ॥ कहें
तुका मैं ताको दास । नहिं सिरभार चलावे पास ॥ ४ ॥
४३५. लाल कंबली
वोढे पेनाये । मोसु हरिथे कैसे बनाये ॥ १ ॥ कहे सखि तुझें करीते सोर ।
हिरदा हरिका कठिन कठोर ॥ २ ॥ नहिं क्रिया सरम कछु लाज । और सुनाऊं बहुत हे
भाज ॥ ३ ॥ और नामरूप नहिं गोवलिया । तुका प्रभु माखन खाया ॥ ४ ॥
४३६.
राम कहो जीवना फल सो ही । हरिभजनसुं विलंब न पाई ॥ धृ. ॥ कवनका मंदिर
कवनकी झोपरी । एक रामबिन सबही फुकरी ॥ २ ॥ कवनकी काया कवनकी माया । एक
रामबिन सबहि जाया ॥ ३ ॥ कहे तुका सबहि चलणार । एक रामबिन नहिं वो सार ॥ ४ ॥
४३७.
काहे भुला धनसंपत्ती घोरे । रामनाम सुन गाऊ हो बापुरे ॥ १ ॥ राजे लोक सब
कह तूं आपना । जब काल नहिं पाया ठाना ॥ २ ॥ माया मिथ्या मनका सब धंदा ।
तेजो अभिमान भजो गोविंदा ॥ ३ ॥ राना रंक डोंगरकी राई । कहे तुका करहिलाई ॥ ४
॥
४३८. काहे रोवे आगले मरना । गंव्हार तूं भुला आपना ॥ धृ.॥ केते
मालुम नहिं पडे । नन्हे बडे गये सो ॥ २ ॥ बाप भाई लेखा नहिं । पाछे तूं हि
चलनार ॥ ३ ॥ काले बाल सोपत भये । खबर पकरो तुका कहे ॥ ४ ॥
४३९. क्या
मेरे राम कवन सुख सारा । कहकर दे पुछूं दास तुम्हारा ॥ १ ॥ तनजोबनकी कोन
बऱ्हाई । व्याधिपीडा दिस काटहि खाई ॥ २ ॥ कीर्त बधाऊं तों नाम न मेरा ।
काहे झुटा पछताऊं घेरा ॥ ३ ॥ कहे तुका नहिं समजत मात । तुम्हारे शरन जोरत
ही हात ॥ ४ ॥
४४०. देखत अखों झुटा कोरा । तो काहे छोरा घरबार ॥ १ ॥
मनसुं किया चाहिये पाख । उपर खाक पसारा ॥ २॥ कामक्रोध सो संसार । वो सिरभार
चलावे ॥ ३ ॥ कहे तुका सो संन्यास । छोडे आस तनकी हि ॥ ४ ॥
४४१.
रामभजन सब सार मिठाई । हरि संताप जनमदुख राई ॥ धृ. ॥ दुधभात घृत साकरपारे ।
हरते भुक नहिं अंततारे ॥ २ ॥ खावते जुग सब चलिजावे । खाटमिठा फिर परचत आवे
॥ ३ ॥ कहे तुका रामरस जो पावे । बहुरी फेरा वो कबहु न खाये ॥ ४ ॥
४४२.
बारबार काहे मरत अभागी । बहुरी मरनसे क्या तोरे भागी ॥ १ ॥ ये हि तन करते
क्या ना होय । भजन भगति कर वैकुंठ जाय ॥ ५ ॥ रामनाम मोल नहिं बेचे कबरि ।
वो हि सब माया छुरावत झगरी ॥ ३ ॥ कहे तुका मनसुं मिल राखो । रामरस जिव्हा
नित चाखो ॥ ४ ॥
No comments:
Post a Comment